
पुरी: भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा में सिर्फ भक्ति ही नहीं, बल्कि रिश्तों की खूबसूरत मिसाल भी देखने को मिलती है। हर साल प्रभु अपने भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ श्रीमंदिर से निकलकर ऐसे स्थान पहुंचते हैं, जिसे श्रद्धालु प्रेम से उनका मौसी का घर कहते हैं। यहां कुछ दिनों का प्रवास, खास भोग और पारंपरिक रस्में इस यात्रा को और भी खास बना देती हैं।
कौन हैं भगवान की मौसी?
पुरी की परंपराओं में इस सवाल के दो जवाब मिलते हैं। एक मान्यता में गुंडिचा देवी को भगवान की मौसी माना जाता है, इसलिए रथयात्रा के दौरान प्रभु उनके मंदिर में सात दिन तक ठहरते हैं। वहीं दूसरी मान्यता मौसी मां (अर्धशोशिनी) मंदिर से जुड़ी है, जहां बहुदा यात्रा के समय भगवान का रथ रुकता है और उन्हें पोड़ा पीठा का भोग लगाया जाता है।
हर साल क्यों जाते हैं?
लोककथाओं के मुताबिक, मौसी के स्नेह और आग्रह के कारण भगवान जगन्नाथ ने हर वर्ष उनके घर आने का वचन दिया था। तभी से यह परंपरा रथयात्रा का अहम हिस्सा बन गई और आज भी उसी श्रद्धा के साथ निभाई जाती है।
डिस्क्लेमर: इस लेख में दी गई सभी जानकारियां सामाजिक और धार्मिक आस्थाओं पर आधारित हैं. News4u36 इसकी पुष्टि नहीं करता. इसके लिए किसी एक्सपर्ट से सलाह अवश्य लें.



