नवरात्रि का तीसरा दिन मां दुर्गा के तीसरे स्वरूप मां चंद्रघंटा की पूजा को समर्पित है। इस दिन भक्त माता की आराधना करके शांति, समृद्धि और शक्ति की प्राप्ति का आशीर्वाद लेते हैं।
मां चंद्रघंटा का स्वरूप और महत्व
माता चंद्रघंटा के मस्तक पर अर्धचंद्र और हाथ में घंटा होता है।
चंद्रमा शांति का प्रतीक है।
घंटा नाद (ध्वनि) और ऊर्जा का प्रतीक माना गया है।
देवासुर संग्राम के समय देवी के घंटा-नाद से कई असुर नष्ट हो गए थे। यह दर्शाता है कि नाद (ध्वनि) में अपार शक्ति होती है। इसी कारण पूजा-पाठ और आराधना में मंत्र और नाद का विशेष महत्व बताया गया है।
पूजा का महत्व
मां चंद्रघंटा की उपासना से मन को शांति और ध्यान की शक्ति मिलती है। उनकी कृपा से जीवन में संतुलन, साहस और आंतरिक शक्ति की वृद्धि होती है।
मां चंद्रघंटा के मंत्र
मूल मंत्र:
“पिण्डज प्रवरारूढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता।
प्रसादं तनुते महयं चन्द्रघण्टेति विश्रुता॥”
देवी स्तुति:
“या देवी सर्वभूतेषु मां चंद्रघंटा रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥”
भक्तजन इस दिन सिद्धकुंजिका स्तोत्र का पाठ भी करते हैं, जिसे बेहद मंगलकारी माना जाता है।
प्रिय भोग
माता चंद्रघंटा को खीर, लड्डू, हलवा और मौसमी फल चढ़ाना शुभ माना जाता है। कई भक्त उन्हें चूरमा का भी भोग लगाते हैं।
