भाग 1: रात 2:15 का अनजान मैसेज
मेरे फेसबुक पर हमेशा से 200 से ज्यादा फ्रेंड नहीं रहे। मैं वैसे भी बहुत कम पोस्ट करता हूँ, बस स्क्रॉल करता रहता हूँ। दोस्तों की शादी, बच्चों की तस्वीरें, कुछ लोगों की सियासत, कुछ की शायरी। बस।
लेकिन उस रात सब कुछ बदल गया।
तारीख थी 15 नवंबर। रात के 2:15 बजे थे। मैं अनिद्रा की बीमारी से जूझ रहा था, तो फोन उठाया। नोटिफिकेशन में एक मैसेज रिक्वेस्ट थी।
प्रोफाइल नाम: “कोई नहीं”
प्रोफाइल पिक्चर: पूरी तरह काली।
बायो: “हर किसी की कहानी होती है। मैं सिर्फ सुनता हूँ।”
आमतौर पर मैं ऐसी रिक्वेस्ट इग्नोर कर देता। लेकिन उस रात कुछ अलग था। शायद अकेलापन, शायद उत्सुकता। मैंने स्वीकार कर ली।
पहला मैसेज आया— “नींद नहीं आ रही?”
मैं चौंक गया। ये कैसे पता? मैंने प्रोफाइल चेक किया। कोई कॉमन फ्रेंड नहीं। कोई टैग नहीं। कोई पोस्ट नहीं। पूरा अकाउंट खाली।
मैंने लिखा— “तुम कौन हो?”
जवाब आया— “कोई नहीं। बस एक अनजान। बात करनी है तो करो, नहीं तो ब्लॉक कर दो।”
उसकी बेबाकी ने मुझे रोक लिया। मैंने लिखा— “नींद नहीं आ रही।”
उसने लिखा— “मुझे पता है। पिछले 2 हफ्ते से तुम रात 2 बजे से पहले सोए नहीं हो। वो भी तब, जब दवा खाते हो।”
मेरे हाथ काँपने लगे। मैंने फिर पूछा— “तुम मुझे कैसे जानते हो?”
जवाब— “मैं तुम्हें नहीं जानता। मैं सिर्फ देखता हूँ। अब सो जाओ। कल बात करेंगे।”
और वो ऑफलाइन हो गया।
मैं उस रात सो नहीं सका। सुबह उठकर मैंने उसकी प्रोफाइल फिर से खंगाली। कुछ नहीं। कोई फोटो नहीं, कोई फ्रेंड नहीं, कोई लोकेशन नहीं। बस एक नाम— “कोई नहीं”।
मैंने उसे मैसेज किया— “सुप्रभात। अब बता सकते हो कि तुम हो कौन?”
दोपहर 3:15 पर रिप्लाई आया— “सुप्रभात। मैंने कहा ना, मैं कोई नहीं हूँ। बस एक शख्स जो तुमसे बात करना चाहता है।”
मैंने लिखा— “क्यों?”
जवाब— “क्योंकि तुम अकेले हो। और अकेले लोगों की आवाज़ सुनाई नहीं देती। मैं उनकी आवाज़ हूँ।”
मैंने सोचा कोई मजाक कर रहा है। शायद कोई दोस्त नए अकाउंट से। मैंने अपने करीबी दोस्तों को मैसेज किया— “तुम हो क्या ये?” सबने ना कहा।
मैंने उस अनजान को इग्नोर करने का फैसला किया। तीन दिन तक कोई बात नहीं की। लेकिन चौथे दिन उसने एक मैसेज भेजा जिसने मेरी रूह हिला दी।
*”तुमने 3 साल पहले 17 मई को एक पोस्ट लिखी थी— ‘जिंदगी से लड़ते-लड़ते थक गया हूँ।’ उस दिन तुमने आत्महत्या करने की सोची थी। लेकिन नहीं की। क्योंकि उस दिन तुम्हारी माँ ने तुम्हारे कमरे में आकर कहा— ‘बेटा, खाना खा लो।’ और तुम रो पड़े थे।”*
मैं पढ़कर सन्न रह गया।
ये बात मैंने कभी किसी को नहीं बताई। ना दोस्तों को, ना परिवार को। ये सिर्फ मेरे और मेरी माँ के बीच की बात थी।
मैंने काँपते हाथों से लिखा— “तुम कौन हो?! ये तुम्हें कैसे पता?”
जवाब आया— “मैं वो हूँ जो तुमसे छुपा है। अब डरो मत। कल रात 9 बजे मैं तुमसे मिलूंगा। तुम्हारे घर के सामने वाले पार्क में।”
मैंने लिखा— “नहीं, पहले बताओ कौन हो तुम!”
लेकिन वो ऑफलाइन हो गया। और उसके बाद से उसकी प्रोफाइल गायब हो गई। जैसे थी ही नहीं।
मैं पागल हो गया। पूरा दिन उस अकाउंट को ढूंढता रहा। कुछ नहीं मिला।
रात 8:45 बजे मैं पार्क में पहुँच गया। दिल तेज़ धड़क रहा था। मैंने एक बेंच पर बैठकर इंतज़ार किया।
9 बजे… 9:15… 9:30… कोई नहीं आया।
मैं निराश होकर घर लौटा। सोचा, कोई शैतानी मजाक था।
लेकिन जैसे ही मैंने घर का दरवाज़ा खोला, मेरे पैर ज़मीन पर जम गए।
फोन पर एक नया मैसेज था। अब अकाउंट का नाम था— “मैं हूँ”
मैसेज पढ़ा— “मैं आया था। तुम्हें देखा। लेकिन अभी वक्त नहीं आया। तुम मुझसे मिलने को तैयार नहीं हो।”
मैंने कहा— “कब तैयार हो जाऊंगा?”
जवाब— “जब तुम सच्चाई जानोगे। तुम जानते हो कि तुम्हारे फेसबुक पर 187 फ्रेंड हैं। लेकिन असल जिंदगी में तुम्हारा कोई नहीं। मैं वो हूँ जो तुम्हारे पास हमेशा से था, पर तुमने देखा नहीं।”
भाग 2: वो सच जो मैंने खुद से छुपाया
अगले 7 दिनों तक वो अनजान हर रात मुझे मैसेज करता। बातें करता। मेरे बारे में ऐसी बातें बताता जो सिर्फ मुझे पता थीं।
मुझे बताया— “तुम 8 साल की उम्र में साइकिल चलाना सीख रहे थे, गिरे थे, घुटना फट गया था। तुमने माँ से छुपाया था।”
बताया— “तुम्हारी पहली सैलरी से तुमने अपने पिता के लिए जूते खरीदे थे। वो जूते आज भी उनके अलमारी में हैं।”
बताया— “तुम जिस लड़की से प्यार करते थे, उसकी शादी हो गई। तुम उसकी शादी में गए थे। मुस्कुराए थे। लेकिन रात को रोए थे।”
हर बात सच थी। हर बात निजी थी। हर बात मेरी थी।
मैं डर गया था, लेकिन साथ में अजीब सी सुकून भी था। कोई था जो मुझे जानता था। सच में जानता था। बिना किसी फिल्टर के।
आठवें दिन मैंने उससे पूछा— “तुम मुझसे क्या चाहते हो?”
जवाब आया— “बस इतना कि तुम खुद से मिलो।”
मैंने कहा— “मैं खुद से मिलूं? मैं तो खुद हूँ।”
जवाब— “नहीं। तुम वो नहीं हो जो तुम हो। तुम वो हो जो दुनिया ने बना दिया। मैं तुम्हें असली तुमसे मिलवाना चाहता हूँ।”
मैंने कहा— “कैसे?”
जवाब— “कल रात 9 बजे। वहीं पार्क में। अब मिलना जरूरी है।”
मैं अगली रात पार्क गया। इस बार डर नहीं था। उत्सुकता थी। जिज्ञासा थी। कौन है वो? कोई पुराना दोस्त? कोई रिश्तेदार? कोई साइकोलॉजिस्ट?
9 बज गए। 9:15। 9:30। फिर से कोई नहीं आया।
मैं निराश होकर उठा ही था कि मेरे फोन की घंटी बजी। उसी अनजान का मैसेज।
“तुम्हारे पीछे देखो।”
मैं मुड़ा। पार्क के अंत में एक लैंपपोस्ट के नीचे एक शख्स खड़ा था। काली हुडी, चेहरा छुपा हुआ। मैं उसकी तरफ बढ़ा।
जैसे-जैसे मैं करीब आया, उसने हुडी उतारी।
और मैं वहीं ठिठक गया।
वो शख्स… मैं था।
बिल्कुल मेरे जैसा। वही चेहरा, वही आँखें, वही हाथ। बस एक फर्क था— उसकी आँखों में वो चमक थी जो मेरी आँखों में 10 साल पहले थी। वो हँसी थी जो मैंने खो दी थी।
मैं चिल्लाया— “कौन हो तुम?!”
वो बोला— “मैं तुम हूँ। वो तुम जो तुमने मार डाला।”
मैं सबकुछ भूलकर वहीं बैठ गया। वो मेरे सामने आकर बैठ गया।
बोला— “याद है, तुम बचपन में पेंटिंग करते थे? तुम्हारी हर पेंटिंग स्कूल में फर्स्ट आती थी। फिर पिताजी ने कहा— ‘पेंटिंग से पेट नहीं भरता, पढ़ाई करो।’ और तुमने पेंटिंग छोड़ दी। वो पेंटिंग मैं करता था। तुमने मुझे मार डाला।”
“याद है, तुम्हें संगीत सुनना पसंद था? गिटार सीख रहे थे। फिर लोगों ने कहा— ‘बड़े हो गए हो, बचकानी हरकतें छोड़ो।’ और तुमने गिटार बेच दिया। वो गिटार मैं बजाता था। तुमने मुझे मार डाला।”
“याद है, तुम वो लड़की से प्यार करते थे? उससे कहना चाहते थे, लेकिन डर गए। ‘लोग क्या कहेंगे?’ सोचकर चुप रहे। वो प्यार मैं था। तुमने मुझे मार डाला।”
“तुमने मुझे हर दिन मारा। हर फैसले में मारा। हर डर में मारा। और अब तुम अकेले हो। क्योंकि मैं ही तो तुम्हारा साथी था।”
मैं रोने लगा। सच में रोने लगा। 10 साल का दबाव एक साथ फूट पड़ा।
मैंने कहा— “मैं क्या करूँ?”
वो बोला— “मुझे वापस ले आओ। पेंटिंग करो। गिटार खरीदो। प्यार करो। डरना बंद करो। दुनिया के लिए नहीं, अपने लिए जियो।”
मैंने पूछा— “तुम फेसबुक पर क्यों आए?”
वो मुस्कुराया— “क्योंकि तू असल जिंदगी में खो गया था। तू वहाँ भाग रहा था जहाँ लोग दिखते हैं, पर दिल नहीं। मैंने सोचा, वहीं से शुरुआत करूँ। जहाँ तू सबसे ज्यादा भाग रहा है।”
मैंने उस रात उससे वादा किया— मैं बदलूंगा।
अगले दिन मैंने फेसबुक पर एक पोस्ट लिखी। पहली पोस्ट 3 साल में।
“मैंने 10 साल पहले खुद को खो दिया था। आज उससे मिला हूँ। अब नहीं खोऊंगा।”
मैंने पुरानी पेंटिंग निकाली। गिटार खरीदा। उस लड़की को मैसेज किया जिससे प्यार था— शादीशुदा थी, लेकिन मैंने सिर्फ कहा— “तुम अच्छी हो, बस इतना कहना था।” उसने हँसकर जवाब दिया।
और उस अनजान दोस्त का अकाउंट? अगली सुबह गायब था। पूरी तरह। जैसे था ही नहीं।
लेकिन मैं जानता हूँ— वो मुझमें है। अब हमेशा रहेगा।
अब मैं फेसबुक खोलता हूँ तो सिर्फ दूसरों की जिंदगी नहीं देखता, अपनी भी जीने लगा हूँ।
क्योंकि सबसे बड़ा दोस्त वो होता है, जो हम खुद से छुपा लेते हैं। उससे मिलने के लिए किसी अनजान का इंतज़ार मत करो। वो अनजान तुम्हारे अंदर ही है। बस आवाज़ दो।
अंत।
कहानी पसंद आए तो बस एक बात याद रखना— खुद को मत खोना। दुनिया तो आती-जाती रहेगी, पर तुम्हारा ‘असली तुम’ ही तुम्हारी सबसे बड़ी दोस्त है।
